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मिलये कुश्ती के असली सुल्तान गूंगा पहलवान से

जब भी हमारे साथ कुछ बुरा होता है तो हम भगवान को कोसने लग जाते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते है जो भगवान को कोसने की बजाय खुद पर विश्वास रखते हैं और तमाम मुसीबतों की दीवारों को लांघकर एक ऐसा कीर्तिमान बना देते हैं की वो और लोगो के लिए एक प्रेरणा का श्रोत बन जाते हैं

आज हम एक ऐसे ही इंसान की कहानी बताने जा रहे हैं जिसका संघर्ष उसके जन्म लेने से ही शुरू हो गया था। खेलों में सबसे ज्यादा मैडल अपने नाम करने वाले हरियाणा प्रदेश के झज्जर जिले के छोटे से गाँव सासरौली में अजित सिंह व् माना देवी के घर एक लड़का पैदा हुवा।घर में लड़का होने की खुशी तो हुई लेकिन इसके साथ घर वालो की चिंता भी बढ़ गयी क्यूंकि यह लड़का न बोल सकता था न सुन सकता था।

virender singh - gunga pahlwan
virender singh – gunga pahlwan

लेकिन उनके पिता अजित सिंह (वो अपने समय के उस क्षेत्र के जाने माने पहलवान है ) ने हार नहीं मानी और महज 8 साल की उम्र से उसको अपने साथ अखाड़े में ले जाने लगे। कठिनाइयां दांव-पेंच सिखाने से लेकर कुश्ती की बारीकियां समझाने तक हर जगह आती लेकिन बेटा दिमाग से काफी तेज़ था, बहुत जल्दी ही चीजों को समझता और सीख लेता.

पिता जी की मेहनत रंग लाने लगी लड़का सालाना मेले में आयोजित कुश्ती जीत कर आया, इस पहली जीत पर पिता जी ने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया. उस दिन का दिन था और आज का दिन है, उस लड़के ने कभी मुड़ कर नहीं देखा, जब कभी भी कुश्ती करने के लिए उतरा जीत कर ही लौटा.

उसकी पहलवानी की गाथा धीरे-धीरे हरियाणा के गांवो में सुनाई देने लगी। लोग उन्हें ‘गूंगा पहलवान’ के नाम से बुलाने लगे। देश के दंगल में शोहरत हासिल करने के बाद वीरेंदर ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेना शुरू किया।

virender sing - gunga pahlwan
virender sing – gunga pahlwan

हम बात कर रहे हैं कुश्ती के असली सुल्तान वीरेंदर सिंह उर्फ़ गूंगा पहलवान की जिसे कुश्ती में ओलिंपिक में मैडल जितने वाले सुशील कुमार भी नहीं हरा पाए।सुशील वीरेंदर से 5 बार कुश्ती लड़े हैं और पांचो बार मैच ड्रा रहा है।

गोल्ड मेडल भी जीत चुके हैं वीरेंद्र :

साल 2005 में मेलबर्न में आयोजित डेफ ओलंपिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतने वाले वीरेंदर एकमात्र खिलाड़ी थे । इसके बाद इन्होने 2009 में ताइपे डेफलिम्पिक्स में कांस्य पदक, 2008 वर्ल्ड डेफ रेसलिंग में रजत पदक और 2012 की वर्ल्ड डेफ रेसलिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। साल 2013 में बुल्गारिया में हुए डेफलिम्पिक्स में उन्होंने दोबारा स्वर्ण पदक जीता। साल 2009 में वीरेंदर ने वो खिताब हासिल किया, जिसका सपना हर देशी खिलाड़ी दंगल लड़ने से पहले देखता है। वीरेंदर ने ‘नौ सेरवें’का खिताब अपने नाम किया, ये खिताब उस पहलवान को मिलता है, जो लगातार नौ रविवार तक सभी दंगल जीतते हैं। 2017 में तुर्की डेफलिम्पिक्स में वीरेंदर ने तीसरी बार गोल्ड मैडल जीता।

सरकार से सहायता की बजाय मिला सिर्फ आश्वासन :

भारत सरकार की तरफ से वीरेंदर को सहायता के नाम पर बस आश्वासन मिलता आया है खेल निति में बदलाव के बाद भी वीरेंदर को सरकार ने उसकी इनाम राशि अभी तक नहीं दी है यहां तक की जब वीरेंदर 2017 के तुर्की डेफलिम्पिक्स में गोल्ड मैडल जीत कर वापिस अपने देश आया तो उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर कोई मौजूद तक नहीं था। न तो खेल मंत्री की ओर से कोई संदेश आया और न ही कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृज भूषण सिंह की ओर से कोई मदद मिली।

IndiaDekho टीम की अपील :

IndiaDekho के सभी पढ़ने वालो से यह निवेदन है की इस पोस्ट को इतना शेयर करो की यह भारत सरकार तक पहुंच जाये ताकि तमाम कठिनाइयों से जूझते हुए देश का नाम रोशन करने वाले इस खिलाडी को अपना हक़ व् सम्मान मिल सके।

यह भी पढ़ें : दाँव-पेंचों के गुरु – सतपाल पहलवान की कहानी

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