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कभी बेचते थे अखबार आज शहीदों के परिवारों को दिला रहे हैं एक नयी पहचान

अब तक किताबों में कहानी पढ़ते थे की कोई अपनी मेहनत से कैसे आगे बढ़ता है। कोई अपनी अलग सोच से कैसे दूसरों के मानस पटल पर अपना निशान छोड़ता है। आज जब एक ऐसे ही शख्स से बात हुई तो विस्वास अडिग हो गया। चालीस साल पहले जो पटना के सड़कों पर अखबार बेचता था, दूसरों की कहानी का विपरण करता था, आज भारत ही नहीं, विश्व के पत्रकार, चाहे कनाडा में हों या लन्दन में; उस बालक पर, उनके प्रयास पर कहानी फक्र से लिख रहे हैं। मुझे भी आज उनके बारे में, उनके प्रयास के बारे में लिखते फक्र हो रहा है। 
पुणे के चापेकर भाइयों का वंशज ​
पुणे के चापेकर भाइयों का वंशज ​

कौन हैं शिवनाथ झा और क्या कर रहे हैं :

 पेशे से पत्रकार शिवनाथ झा एक ऐसी खोजी पत्रकारिता कर अपनी खोज को दस्तावेज में समेट रहे हैं, जिसे आज की पीढ़ी को ही नहीं, आने वाले नश्लों को गौरवान्वित करेगा। वैसे उनकी यह खोज और उनका यह सोच, भारत के करोड़ों लोगों को, विशेषकर, जो स्वयं को राष्ट्रभक्त मानते हैं, उनके मस्तष्क को शर्मसार कर दिया है। जिस कार्य को भारत के समाज के सभी लोगों को करना चाहिए था, आज एक ‘अर्थहीन’, परन्तु हिम्मत से मजबूत और मेहनतकश मनुष्य के कंधे पर गौरवान्वित हो रहा है। मैं बात कर रहा हूँ १८५७-१९४७ आज़ादी के महान क्रान्तिकारियों और शहीदों के बारे में। आज़ादी के दौरान हज़ारों, लाखों भारतीय क्रांतिकारी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दिए। आज आज़ादी के सत्तर साल बाद, महज कुछ क्रान्तिकारियों और शहीदों को छोड़कर, जिनका आज भी देश के राजनीतिक बाजार में मूल्य है, “जीवित” हैं; शेष गुमनाम हो गए। फिर उनके जीवित वंशजों को कौन जानता है, पहचानता हैं? इंडिअनमार्टीअर्स इन संस्था के तहत शिवनाथ अब तक गुमनाम क्रान्तिकारियों और शहीदों के ७० वंशजों को ढूंढे हैं और छः किताबों के माध्यम से छः शहीदों के वंशजों के परिवारों को गुमनामी जीवन से निकाल कर समाज की मुख्य धारा में लाये हैं। इन परिवारों में तात्या टोपे, बहादुर शाह ज़फर, उधम सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल के वंशज प्रमुख हैं।
Basudev Balvant Fadke's bloodlines
Basudev Balvant Fadke’s bloodlines

कैसे हुई शुरुवात  :

इस प्रयास की शुरुआत सन २००५ से हुई जब भारत रत्न शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाह खान को अपने जीवन के अंतिम बसन्त में अपने लिए मदद की गुहार लगनी पड़ी। शिवनाथ और इनकी पत्नी नीना झा, जो पेशे से शिक्षिका हैं, आगे आये और एक किताब “मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बना। किताब को स्वयं खान साहेब ने विमोचन किया अपने जीवन के अंतिम जन्म दिन को २००६ में और उसी वर्ष २१ अगस्त को उस्ताद अल्लाह के पास चले गए। आपको बता दूँ की उस्ताद बिस्मिल्लाह खान दिल्ली के लाल किले पर अपनी शहनाई से स्वतंत्र भारत का स्वागत किया था। शिवनाथ कहते हैं कि भारत में हज़ारों-हज़ार प्रकाशक हैं और लाखों-करोड़ों में किताबों का प्रकाशन होता है। परन्तु शायद ही कोई किताब किसी के जीवन को बदला हो, सिवाय प्रकाशक को छोड़कर। “एक मनुष्य के नाते इतना तो कर ही सकते हैं हम, लोग हमारे प्रयास का साथ दें, मदद करें अथवा नहीं।”

शिवनाथ का जीवन परिचय :

Shivnath Jha
Shivnath Jha
शिवनाथ अपने जीवन की शुरुआत आठ साल के उम्र में १९६८ से प्रारम्भ किये – एक अखबार बेचने वाला विक्रेता के रूप में । कोई आठ साल तक पटना के सड़कों पर, जब बचपन खिलने का उम्र था, अखबार बेचा करते थे। अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाने और अपने माता-पिता का सहायक बनने के लिए । कहते हैं ईश्वर सब कुछ देखता है। शिवनाथ भी ईश्वर के नजर से कभी ओझल नहीं हुए। जब सारा देश सम्पूर्ण क्रांति के महानायक जय प्रकाश नारायण की क्रांति का साल-गिरह मना रहा था, साढ़े चौदह वर्ष के उम्र में पटना से प्रकाशित अखबार – आर्यावर्त-इण्डियन नेशन – में पत्रकारिता के सबसे नीचले वादान पर पैर रखे प्रूफ रीडर के रूप में, वर्ष था १९७५ और महीना मार्च का १८ तारीख। इस तारीख के बाद शिवनाथ कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे। सन १९७५ से २०१७ तक शिवनाथ भारत भारत के लगभग प्रमुख समाचार पत्रों, सम्पादकों के साथ सम्वाददाता के रूप में कार्य करते हुए, ऑस्ट्रेलिया से उद्घोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस रेडियो के हिंदी प्रसारण सेवा में देश का प्रतिनिधित्व करते पञ्चम लहराया। ​गरीबी को बहुत नजदीक से देखे शिवनाथ झा इसलिए आज भी भूख से होने वाले पेट-दर्द की पीड़ा को ह्रदय से महसूस करते हैं आज भी। यही कारण है कि शिवनाथ अपनी पत्रकारिता की सम्पूर्ण सीख को एक ऐसी दिशा में उन्मुख किये जिस तरफ आज़ादी के सत्तर सालों में किसी ने नहीं देखा। हां, भारतीय राजनीतिक-सामाजिक बाज़ार में लोग-बाग़ से लेकर राजनेताओं तक, सबों ने उन महँ हस्तियों का अपने लाभ के लिए व्यापार जरूर किया। ​

क्या है उनकी शहीदो के प्रति सोच  :

शिवनाथ कहते हैं: “​ आज ​ भारतीय समाज में, शैक्षणिक संस्थाओं में, किताबों में और लोगों की सोच में आमूल परिवर्तन हो रहा है, इन क्रांतिकारियों और शहीदों के मद्दे नजर, सकारात्मक नहीं है। आज की पीढ़ी, या पहले की पीढ़िया भी, अपने बच्चों को स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में, शहीदों के बारे में, उनके वलिदानों के बारे में, उनके त्याग के बारे में एक शब्द भी नहीं बताते। लेकिन उनसे उम्मीद यह जरूर रखते हैं की उनका संतान संस्कारी के साथ साथ एक इंसान भी बने और राष्ट्र के प्रति समर्पित भी हो। यह संभव नहीं है। मजह स्मार्ट फोन हाथ में होने, या स्मार्ट शहर में रहने से मानसिकता स्मार्ट नहीं हो सकता ​और यही कारण है की आज के बच्चे मंगल पण्डे के रूप में आमिर खान को जानते हैं, भगत सिंह के रूप में अजय देवगन को। यह शुभ संकेत नहीं है।
आर्थिक रूप से टूटे होने के कारण अवरुद्ध कण्ठ से हम बात को और आगे बढ़ाना चाहते थे। शिवनाथ कहते हैं की जब देश को आज़ादी मिली थी, भारत की आवादी कोई २०-२२ करोड़ थी। आज १२५ करोड़ से भी अधिक है। दुर्भाग्य यह है की इतनी बड़ी आवादी १००-२०० क्रान्तिकारियों, शहीदों के वंशजों को भी प्रतिष्ठित, सम्मानित जीवन नहीं दे सकते हैं और इसके लिए भी सरकार की ओर ऊँगली उठाते हैं। शिवनाथ आगे कहते हैं: “कोई भी संस्था, भवन, चाहे जिसमे सरकार ही क्यों न रहती हो; निर्जीव पदार्थों – ईंट, पथ्थर, सीमेंट, बालू, लोहा, लकड़ी – से बानी होतो है। सवाल सिर्फ यह है कि उस भवन अथवा संस्था में रहने वाले लोग कितने संवेदनशील हैं। लोग जितने संवेदनशील होंगे, वह उतना ही मजबूत होगा। लेकिन, यहाँ भी समाज के ही लोग हैं न !!” “अगर ऐसे प्रयास को भारत के १२५ करोड़ लोगों में से एक लाख लोग ही, प्रतिमाह अपने सम्पूर्ण कार्यकाल से महज १५ मिनट या आधे घंटे की मौद्रिक कमाई से मदद करते हैं; तो आज़ादी के एक भी क्रान्तिकारी या शहीदों का परिवार भूखा नहीं सोयेगा।”
शिवनाथ कहते हैं हमारा प्रयास एक व्यापारी के नजर से करोड़ों-अरबों का है। कई लोगों ने इस प्रयास को हथियाने की कोशिश भी किये क्योंकि मेरे पास अर्थ नहीं है, और आज के युग में अर्थहीन मनुष्य की स्थिति थर्ड-जेण्डर से कम नहीं होती है। जिन-जिन लोगों के पास अपने प्रयास और किताबों का डमी लेकर गया भिक्षाटन करने ताकि वे मदद करें, किताब छपे और फिर शहीदों के वंशजों के घर दीपक जलाऊं, सबों ने हाथ काटने पर ही उतारू हुए। सभी कहे यह दे दें, हम सभी छापेंगे और आपका नाम दे देंगे। इससे बहुत पैसे कमाए जा सकते हैं। अब उन्हें कौन बताये की “पैसे के लिए ही तो मैं भीख मांग रहा हूँ। मुझे क्या पता भिखमंगे की जिंदगी से भी बद्तर है उनकी सोच।” शिवनाथ से बातचीत लम्बी चली परन्तु बातचीत करने में कभी नजर नहीं झुकाते और सामने वालों की आँखों में आँखें इस कदर डालकर बात करते हैं की सामने वालों को अपनी गलती का एहसास होता है। यह उनकी और उनके प्रयास की सबसे बड़ी विशेषता है – बिलकुल अलग।
Pune's Chapekar Brothers' bloodlines
मंगल पांडेय के वंशज
​जब उनसे पूछा की एक ऐसे वंशज के बारे में बताएं जिसे भारत ही नहीं विश्व के लोग जानते हों परन्तु उनके वंशज को नहीं ! शिवनाथ मुस्कुराये और कहे “आप ​श्री नरेन्द्रनाथ दत्त साहेब को जानते हैं ? मेरे मानस पटल को आंकते हुए फिर बोले ‘स्वामी विवेकानन्द’, कौन नहीं जानता है इन्हे, खासकर युवक। परन्तु क्या कोई यह जानता है की विवेकानन्द की अपनी बड़ी बहन सूर्यमणी देवी का वंशज आज भी जीवित है, नहीं न। शिवनाथ अभी इन सभी शहीदों के वंशजों को मिलाकर एक “१८५७-१९४७ मार्टियर्स ब्लडलाईन्स” किताब का डमी बनाये हैं। इसके अलावे, शहीद खुदीराम बोस के गुरु शहीद सत्येन बोस के वंशज को उनके जीवन के अंतिम बसंत में चेहरे पर मुस्कराहट लाने के लिए ३६० पन्नों का सचित्र “बनारस फ्रॉम टाईम इममॉरिअल” पुस्तक का डमी तैयार किये हैं, जिसमे विवेकानन्द की बड़ी बहन सूर्यमणी देवी के वंशज भी ९९०-शब्द लिखे हैं। इसके अलावे लखनऊ और गया पर भी दो बेहतरीन काफी-टेबुल किताब का डमी तैयार किये हैं। ये सभी किताबें शहीदों के वंशजों को नया जीवन देने का एक पहल है। परन्तु, अर्थाभाव के कारण अभी किसी भी किताब को छाप नहीं पाए हैं जिससे शिवनाथ उदास हैं। परन्तु हिम्मत नहीं हारे हैं। कहते हैं : “ईश्वर देख रहा है, रास्ता वही निकलेगा।” {अगर आप इस प्रयास का हिस्सा बनना चाहते हैं तो संपर्क करें }

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